They like to read my Life

Sunday, February 19, 2017

वो है कही



कुछ दूर चलके,
धीरे-धीरे गुम सी हो गई है आवाज़ वो,
कानो को आदत सी हो गई है,
खामोशी की अब.



धुऑ-धुऑ सा तो नही था,
आंखो के आगे ,
पर तस्वीर उसकी ,
धूंधला –सी गई है अब .


जिक्र बातो मे अक्सर होता है उसका,
जुबां पर नाम भी आता है कभी,
फिर दिल से एक आवाज़ आती है,
और अल्फाज़ दिल मे दबे से रह जाते है अब.


हाथो को देखा तो लकिरो ने कहा,
करीब से देखो ज़रा,
वो लाइन जो उससे तुम्हे मिलाती,
मिट गई है अब.





बारिश मे वो नाव चलाती थी जब,
काश उसमे संग उसके बैठ जाता तब ,
छतरी अपने दिल की खोलकर उसमे उसे बैठाता,
दुनिया की भीड से दूर एक नयी दुनिया बसाता अब.


किस्से कहाँनियो मे पढा था मैंने,
बचपन की यादो मे सुना भी था शायद,
के कुछ लोग सिर्फ मिलते है,
जुदा होने के लिये अब.


ख्यालो मे हो या फिर कविता मे ,
या फिर उन किस्सो मे
,
वो बसी हुई है
,
हर कहाँनी मे अब.

(चिराग जोशी)
 

Saturday, November 26, 2016

एक ऐसा रिश्ता भी है


जब मैं पैदा हुआ था शायद तब से ही वो मेरे साथ था । तब शायद मैं उसे जान नही पाया था । फिर भी बाद मे ये एहसास हुआ के ये तो तब भी वही था । जब मैं पांच साल का हुआ तब मैंने उसे देखा और ये कहू के देखा तो पहले भी  था पर समझा पहली बार , उसके बाद तो फिर वो मेरे साथ मेरे साये की तरह रहा और आज भी वो मेरे साथ है
 
 
मेरे सुख-दुख , सफलता- असफलता की हर कहानी मे मैंने उसे पाया है । मेरी जिंदगी मे जो रंग मुझे भरने थे वो रंग उसमे ही समाये थे । कभी रंगो से वो भीगा भी और साल –दर साल उसे मे नये परिवेश मे देखता भी गया , परंतु रुह उसकी हमेशा वही थी । बदला तो बस शरीर ही था । मौसम बारिश का हो या गरमी का उसने उस ज्ञान को जो उसने अपने भीतर रख रखा था । उस पर कभी आंच नही आने दी । ख्वाब हो या हकीकत हर वक्त और या ये कहू हर सांस मे वो था । जब-जब वो मुझे नही मिलता एक अज़ीब से बैचेनी मुझे हो जाती थी । लगता था दुनिया ही खत्म हो गई हो , परंत साल के कुछ महीने ऐसे भी थे जब मैं उसे भी आराम दे देता था । मॉ के हाथ के बने पराठे , सेंड्विच , अचार, सब्जी, रोटी या मिठाई हर चीज़ हमने मिल-बाट कर खायी थी । कई बार गुस्से मे और जाने-अनजाने मे मैंने इसपर जाने क्या-क्या फेका, कभी इसे ही धक्का दे दिया पर इसने कभी मेरी बात का बुरा नही माना । जब-जब मुझे जरुरत हुई इसने मेरा साथ दिया ।




जैसे – जैसे साल बीतते गये मैं बडा होता गया और वो दुबला हो गया । जब मैं कालेज़ मे आया तो सोचा के आखिर ऐसा क्यो हुआ ? कुछ साल तो मुझे बिल्कुल ही समझ नही आया फिर जब कालेज़ का आखरी साल आया तो लगा के अब मैं इसे मॉ के हाथ से बना खाना नही खिलाता हू और शायद यही कारण रहा इसके दुबले होने का या फिर शायद ये जिम जाने लगा हो पर ये तो हमेशा साथ ही रहा । मेरे बिस्तर पर आराम करता  तो कभी टेबल या कुर्सी पर और कभी मैं इसकी गोद मे सर रखकर सो जाता था । कालेज़ के दिनो मे शायद इसने भी मेरे संग इश्क किया होगा । अपने महबूब को देखकर कभी इसको शरमाते हुये तो नही देखा पर हा अगडाई जरुर लेता था । बस और ट्रेन मे हर जगह मेरे लिये जगह रखता था । 


नौकरी लगी तो भी साथ था पर फिर ये और छोटा हो गया था । पर एक अच्छी बात हुई के अब फिर से मैंने इसे मॉ के हाथ का बना खाना खिलाना शुरु कर दिया था । कुछ साल बाद जब शादी हुई तो पत्नी के हाथ का खाना ये भी खाने लगा मेरे साथ । जब अकेला रहता हु तो इसके संग बाते भी हो जाती है । बातो मे लफ्ज़ नही होते है , बस एहसासो से ही बात होती है । एक दिन इसी एहसास मे इसने कहा –शुक्रिया । मैंने पूछा किसलिये , तो कहता है – “ तुम्हारे बिना मेरा कोई अस्तित्व नही है । अब जब तुम कामयाब हो गये हो तो शायद मेरी जरुरत नही हो तुम्हे फिर भी तुम मुझे अपने से अलग नही करते हो ।“ मैंने इससे कहा के कभी धडकन दिल से अलग हुई है जो तुम्हे अलग कर दू ।जब-जब मैं गिरा ये भी गिरा और फिर हम साथ उठे और आगे बढे ।  मुझे ऐसा लगता है इसका और मेरा एक गहरा रिश्ता है । ये रिश्ता इसकी और मेरी रुह का है । जो कभी अलग नही होने वाली । जब मैं काम करना बंद कर दुंगा तो ये मेरी कलम ,डायरी और टोपी को सभांलेगा और मेरे मरने के बाद कुछ देर तो रोयेगा । परंतु मेरा दुसरा जन्म होते ही हम फिर साथ-साथ होंगे ।



ये कहानी थी मेरी और मेरे बस्ते की या बैग जो नाम आप इसे देना चाहे , जब से पैदा हुआ और जब इस दुनिया को छोड के जाउंगा ।  हमेशा साथ रहेगा ये मेरे हर किस्से मे हर कहानी मे , अभी भी देख रहा है और कह रहा है – “ क्या लिख रहे हो “ जब  इसे अपने कंधे जब रखता हू ऐसा लगता है कोई है  जो साथ है, साथ था और साथ रहेगा ।

Tuesday, November 15, 2016

रायता फैल ही गया था


भारतीय क्रिकेट टीम ने हाल ही मे टेस्ट क्रिकेट मे नबंर -1 के पद को हासिल किया है । न्यूजीलैण्ड के सीरिज़ जीत से भी टीम का हौसला काफी ऊचा था । “ था “ इसलिये उपयोग किया गया क्योंकी जब भारतीय टीम इंग्लैड के खिलाफ पहला टेस्ट खेलने उतरी तो इस खेल के रचियता इंग्लैड ने उन्हे ये बताया के नबंर एक पर आना और वहा पर टीके रहना दोनो अलग बात है ।
काफी वक्त बाद कप्तान विराट कोहली सिक्के के उछाल मे मात खा गये और इंग्लैड ने राजकोट की पिच पर पहले बल्लेबाज़ी करने का निर्णय लिया । इंग्लैड के कप्तान कूक ये जानते थे के अगर भारत मे पहले बल्लेबाज़ी नही की तो मैच हारने का प्रतिशत काफी तेजी से बढ्ता है ।


कूक और युवा हमीद (जो अपना पहला टेस्ट मैच खेल रहे थे )  ने एक अच्छी शुरुवात दी और जब लगा के कूक अपना पुराना प्रदर्शन ( भारत के खिलाफ कूक का प्रदर्शन भारत और भारत के बाहर शानदार रहा है )  दोहरायेंगे, रविंद्र जाडेजा ने उन्हे एल.बी.ड्ब्ल्यू किया । इस सीरिज़ मे पहली बार भारत मे डी.आर.एस का उपयोग हो रहा था । इस डिसीज़न को लेकर कूक ने हमीद से बात की पर युवा हमीद का कम अनुभव यहा आडे आ गया , बाद मे देखने पर पता लगा गेंद लेग स्टम्प पर जा रहि थी । खैर इसके बाद उम्मीद थी के इंग्लैड जल्द ही दम तोड देगी और शाम तक विजय और गौतम गम्भीर बल्लेबाज़ी करते दिखेंगे । परंतु इंग्लैड के बल्लेबाज़ राजकोट की इस सपाट पिच पर रन बनाते चले गये . आर. अश्विन जो अधिकतर भारत को ऐसी स्थिती से उबार लेते है कुछ ना कर पाये क्योंकि पिच पर टर्न नही था । अश्विन के ज्यादातर विकेट भी तब आये है जब गेंद घुमे , जैसा मुरलीधरन के साथ होता था । मुरलीधरन और अश्विन जैसे गेंदबाजो को पिच से मदद मिलना जरुरी होता है ।


खैर इंग्लैड टीम की तरफ से तीन शतक लगे और उन्होने अपनी पहली पारी मे 537 रन बनाये । भारत को एक और झटका ये भी लगा के जब गेंद रिवर्स स्विंग हो रही थी तो मोहम्म्द शामी चोटिल हो गये । उन्होने गेंदबाजी तो की परंतु पुरी ताकत से वो गेंद नही कर पाये । गौतम गम्भीर जो वापसी करने की कोशिश कर रहे थे । एक नये स्टांस के साथ उतरे । इस स्टांस से वो दुसरे दिन तो अच्छा खेले लेकिन वो अगले दिन ब्राड की गेंद पर फिर से वैसे ही आऊट हुये क्या करे आदत बदलना  इतना आसान नही है । गौतम को अपना आऊट होना उस वक्त और बुरा लगा  होगा जब पुजारा और विजय ने शतक बना दिये । सपाट पिच पर गेंद मे थोडा सा उछाल था जिसका फायदा इंग्लैड के गेंद्बाजो ने उठाया । गेंद बहुत धीमे  घुम रही थी , भारत के पास मौका था के एक अच्छी बढ्त लेकर इंग्लैड पर दबाव डाले । ऐसा हुआ नही  भारत ने अपनी पहली पारी मे 488 रन बनाये । इंग्लैड ने  दुसरी पारी 260/3 पर घोषित की ,कप्तान कूक ने शानदार शतक जमाया और अपने रंग मे लौट आये ।



आखरी दिन भारत के पास थे 49 ओवर और 310 रन बनाने की चुनौती .कप्तान कोहली ऐसी चुनौती पहले भी स्वीकार कर चुके थे । उस वक्त भारत हार गया था । इस बार शायद ऐसा उनके मन मे नही था । गौतम के पास ये शायद आखरी मौका था और वो इस मौके को भूना नही पाये और शून्य के स्कोर पर आऊट हो गये । जब 47 के स्कोर पर दुसरा विकेट गिरा लगा मैच ड्रा ही होगा । परंतु ऐसे मौके पर रायता फैलाना तो जरुरी था । तो वो फैलना शुरु हुआ 71 पे 4 और फिर 132 पे 6 आऊट हो गये लगा भाई घर मे हारने का सीज़न चल रहा है । अभी पर्थ मे साऊथ अफ्रीका ने आस्ट्रेलिया को हराया और अब हमारी बारी है । कप्तान कोहली टीक गये और साथ मे लिया सर जडेजा को जिनके  आऊट  होने की प्रोबेबिलिटी एक के आसपास थी । 
पर दोनो लौंडे टीक गये और करा लाये मैच ड्रा । सबने  कोहली की तारीफ की परंतु सवाल तो कई बाकी रह गये । सपाट पिच पर तीन स्पिनर खिलाना । जब शमी पूरी तरह फिट नही थे फिर भी उन्हे खिलाया गया और एक सवाल साहा से जिन्होने इस मैच मे कई कैच गिराये ।


उम्मीद है टीम अगले मैच मे अच्छा प्रदर्शन करेंगी बशर्ते है पिच पर इस बार गेंद ज्यादा ना घुमे वर्ना हम ही अपने जाल मे फस सकते थे ।